रानी दुर्गावती चौक बना ‘बैनर-होर्डिंग्स’ का अड्डा; महापुरुषों के सम्मान पर भारी पड़ रही सियासत और प्रशासन की लापरवाही

गोंदिया ( देवरी ) : देवरी शहर का गौरव और प्रमुख पहचान माना जाने वाला ‘रानी दुर्गावती चौक’ इन दिनों अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और स्वयंभू समाजसेवियों ने अपनी चमचागिरी और पब्लिसिटी की भूख में पूरे चौक को होर्डिंग्स और अवैध बैनरों से पाट दिया है। हद तो तब हो गई है जब इन बेतरतीब लगे पोस्टरों के कारण वीरांगना रानी दुर्गावती जी की मुख्य प्रतिमा भी ठीक से नजर नहीं आ रही है। इस पूरे मामले में देवरी नगर पंचायत का रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना और आंखें मूंदने वाला नजर आ रहा है, जिससे स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है।
तस्वीरों में कैद हुई बदहाली:
स्थानीय नागरिकों द्वारा साझा की गई तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह नियम-कायदों को ताक पर रखकर पूरे चौक की दुर्दशा कर दी गई है। चौक के हर खंभे, रेलिंग और यहाँ तक कि प्रतिमा के ठीक आगे-पीछे इतने बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगा दिए गए हैं कि दूर से देखने पर यह कोई ऐतिहासिक चौक नहीं, बल्कि किसी विज्ञापन एजेंसी का बोर्ड नजर आता है। अपनी फोटो चमकाने के चक्कर में कथित समाजसेवियों और नेताओं को इस बात का भी होश नहीं रहा कि वे एक महापुरुष की प्रतिमा और शहर की सुंदरता का अपमान कर रहे हैं।
नगर पंचायत का ‘दुरलक्ष’ (लापरवाही): कब जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन?
इस पूरे विवाद में देवरी नगर पंचायत की भूमिका सबसे ज्यादा संदेहास्पद और सुस्त नजर आ रही है। शहर के बीचों-बीच चल रहे इस ‘बैनर खेल’ पर नगर पंचायत ने पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक दबाव के आगे प्रशासन नतमस्तक है। जब आम जनता को बिना अनुमति के छोटा सा बोर्ड भी लगाने नहीं दिया जाता, तो फिर रसूखदारों को पूरे चौक को कबाड़खाना बनाने की छूट कैसे दे दी गई? नगर पंचायत का यह ‘दुरलक्ष’ (अनदेखी) साफ इशारा करता है कि उन्हें शहर की सुंदरता और महापुरुषों के सम्मान से कोई सरोकार नहीं है।
जनता की आवाज :
“यह सीधे-सीधे वीरांगना रानी दुर्गावती जी का अपमान है। अपनी राजनीति चमकाने के लिए चौक को बदसूरत बना दिया गया है। नगर पंचायत टैक्स तो पूरा वसूलती है, लेकिन जब व्यवस्था सुधारने की बात आए तो अधिकारी अपनी आंखें बंद कर लेते हैं।”
[ स्थानीय नागरिक देवरी ]

शहर का विकास सिर्फ कागजों पर या ऊंचे-ऊंचे दावों से नहीं होता। अगर प्रशासन अपने शहर के मुख्य चौकों और महापुरुषों की प्रतिमाओं की गरिमा नहीं बचा सकता, तो उसे खुद को ‘नगर रक्षक’ कहने का कोई हक नहीं है। देवरी की जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि चौक पर लगी इस राजनीतिक गंदगी से परमानेंट मुक्ति चाहती है।

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